विनोबाजी के जीवन के तीन प्रसंग

(सितम्बर 2009)
11 सितम्बर को विनायक नरहरि भावे, जिन्हें हम विनोबा के रूप में जानते हैं, का जन्म दिवस है। आन्तर भारती के पठकों के लिये उनके जीवन के कुछ प्रेरणादायी प्रसंग प्रस्तुत हैं। – का.सं.

शून्य

जब बापू की आत्मकथा प्रकाशित हो रही थी, तब एक बार उन्होंने मुझे उसके बारे में पूछा। मैंने बताया, आप सत्यवादी हैं, मिथ्या तो कुछ लिखोंगे नहीं, इसलिए किसी का नुकसान तो नहीं होगा, लेकिन फायदा क्या होगा मालूम नहीं, क्योंकि जिसको जो लेना है वह वही लेता है। बापू बोले, तुम्हारे जवाब से मुझे जो चाहिये था वह मिल गया। `नुकसान नहीं होगा´ उतना बस है। जहाँ तक फायदे का ताल्लुक है – वो गुजराती में बोल रहे थे – “आपणां बधां कामोनु परिणाम मींडु छे” (हमारे सभी कामों का परिणाम शून्य है)। उन्होंने हवा में उंगली से बड़ा गोल कर के दिखाया और आगे कहा – “आपणे तो सेवा करी छूटीए” (हमें तो सेवा कर छूट जाना है)। यह बात बिल्कुल मेरे हृदय में पैठ गयी। बापू का सारा तत्वज्ञान इसमें आ जाता है।

दो आने का आहार

सन् 1924 की बात है। मैंने अर्थशास्त्र का अध्ययन शुरू किया था। हमारी भाषा में ज्यादा किताबें नहीं थी इसलिए मैंने तरह-तरह की अंग्रेजी किताबें पढ़ीं। और उस अध्ययन की प्रेरणा के लिए मैंने रोज का गुजारा दो आने में किया( क्योंकि उस समय हिन्दुस्तान में प्रतिव्यक्ति (निम्नतम) उत्पन्‍न डेढ-दो आने का था। उस वक्त मैं तीन दफा खाता था। सात पैसे का खाना और एक पैसे की लकड़ी। यही मेरा हिसाब था। सात पैसे में ज्वार की रोटी, मूंगफली, गुड, दाल, मुट्ठीभर सब्जी, थोड़ा नमक-इमली, इतनी चीजें आती थीं। उन्हीं दिनों बापू के उपवास के कारण मुझे दिल्ली जाना पड़ा। वहाँ ज्चार नहीं मिलती थी, गेहूं ही मिलता था, जो महंगा था, इसलिए वहाँ मुझे मूंगफली छोडना पडा। यह सिलसिला साल भर चला।

कोई भी पूछ सकता है कि अर्थशास्त्र के अध्ययन का इस तपस्या के साथ क्या सम्बन्ध ? मेरा मानना है कि अध्ययन तभी हजम होता है, जब हम अपने को उसके अनुकूल कर लेते हैं। अपनी इन्द्रियों को, प्राणों को कस लेते हैं। मैंने एक दफा दो साल तक बहुत एकाग्रता से वेदों का अध्ययन किया था। उस वक्त भी मैं दूध-भात पर ही रहता था, तीसरी चीज लेता नहीं था। इस तरह विचारों के साथ जीवन का ताल्लुक जोडने की मुझे आदत है। उसे मैं बहुत जरूरी समझता हूँ। इसलिए अर्थशास्त्र के अध्ययन के साथ मैंने अपना जीवन भी जोड दिया। मुझे उस अध्ययन का बहुत लाभ हुआ और निकम्मा अर्थशास्त्र ध्यान में नहीं रहा। टालस्टाय, रस्किन वगैरह के खास अर्थशास्त्र का अच्छा अध्ययन हुआ।

व्यक्तिगत सत्याग्रह

सन् 1940 की सुन्दर सुबह मुझे बापू की तरफ से बुलावा आया कि मिलने आओ। वैसे उनके और मेरे निवासस्थान में पाँच मील का फासला था। लेकिन मिलने का मौका तो तब आता था जब वे बुलायें। साल में दो-तीन पत्र आते-जाते होंगे। वे जानते थे कि यह शख्स अपने काम में मशगूल है, इसलिए इसे ज्यादा तकलीफ नहीं देनी चाहिये। लेकिन उस दिन अचानक बुलावा आया। इसलिये मैं उनके पास पहुँचा। बापू मुझसे कहने लगे कि इस वक्त मुझे तेरी सेवा की जरूरत है। मैं नहीं जानता कि तू खाली है या नहीं। लेकिन अभी व्यक्तिगत सत्याग्रह करना है और में चाहता हूँ कि अगर तू बिना कुछ विशेष तकलीफ के मुक्त हो सका तो तैयार हो जाओ।

मैंने विनोद में कहा, मैं आपका बुलावा और यमराज का बुलावा समान मानता हूँ। इसलिए मुझे जरूरत नहीं कि मैं वापस जाऊँ। सीधे यहीं से काम के लिये जा सकता हूँ। बापू को बहुत समाधान हुआ।

सत्याग्रह करने का तय हो जाने के बाद चर्चा चली कि सत्याग्रह कहाँ से प्रारम्भ करें, नागपुर, वर्धा या पवनार से  ? मैंने तय कर लिया कि वह पवनार से ही होगा। मुझे स्वदेशी धर्म का अनुसरण करने की दृष्टि से जहाँ पर मैं रहता हूँ वहीं से सत्याग्रह का प्रारम्भ करना उचित लगा। तीन साल से मैं वहाँ रह रहा था।

चन्द दिनों में ही मैं जेल पहुँच गया। इस सत्याग्रह में तीन बार पकड़ा गया और लगभग पौने दो साल जेल में गये। बापू ने मुझे भारत की ओर से व्यक्तिगत सत्याग्रही बनने का आदेश दिया था। जेल जाने के बाद सोचने लगा कि अखिल भारत का प्रतिनिधित्व करना है तो हिन्दुस्तान की कुल भाषाएँ सीख लेनी होंगी। परन्तु मुझे तो विश्व का प्रतिनिधित्व करना है, इसलिये दुनिया की भाषाओं का ज्ञान भी प्राप्त करना होगा। इसलिए उस वक्त और फिर अगस्त आन्दोलन में पाँच साल का जो समय जेल में मिला उसमें मैंने बहुत अध्ययन किया। रोज 14-14, 15-15 घंटे पढता था। नागपुर जेल में तो मैं अरबी उच्चारण के लिए रेडियो पर कुर्आन सुनता था।

(अहिंसा की तलाश से सभार)

यह प्रविष्टि प्रेरणा भारती में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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