राष्ट्रीयता, विकेन्द्रीकरण और अलगाववाद

नवम्बर 2008


सभ्यता के विकासक्रम में परिवार और समाज का सृजन हुआ। मानव जीवन कृषि पर आधारित हो गया था, अत: सामूहिक उत्पादन हेतु एक या एक से अधिक परिवारों का साथ रहना आवश्यक था। खेत और निवास-स्थान की रक्षा का प्रबन्ध करने के साथ ही, स्थान विशेष के प्रति लगाव तथा अन्य भूमि पर क़ब्जा करने की प्रकृति का सहज विकास हुआ, इस प्रकार कबीलों का गठन हुआ, उनमें अक्सर संघर्ष और सन्धियाँ होती रहती थी। कबीले को एकजुट रखने, आन्तरिक प्रशासन चलाने, रक्षा, अतिक्रमण आदि के लिए व्यवस्थित सेना और योग्य प्रशासक (राजा) की आवश्यकता हुई। यहीं से राज्यों, साम्राज्यों का निर्माण आरम्भ हुआ।

औद्योगिक क्रान्ति के समय वाष्प, तेल और बिजली से चलने वाली मशीनों के कारण उत्पादन की दर बढ़ी और वह केन्द्रित हुई, इस सब के लिए पूँजी आवश्यक थी (इस दौरान करंसी नोटों का चलन आरम्भ हो गया था) भू-स्वामित्व गौण हो गया तथा पूँजीपति वर्ग अधिक शक्तिशाली हुआ। औद्योगिक क्रान्ति की सफलता के लिए बड़े भू-भाग के प्राकृतिक संसाधनों और खरीददारों (जनता) पर अधिपत्य रखना आवश्यक है। अतः विभिन्न राज्यों को उस आवश्यकतानुसार, भौगोलिक, आर्थिक और राजनैतिक इकाई के रूप में केन्द्रित किया, जो उपनिवेश कहलाए। इस प्रकार साम्राज्यवाद का जन्म हुआ।

इस घटनाक्रम के दौरान बहुत से ऐसे लोग उभरे, जिन्होंने पूँजी और उपनिवेश की बैसाखी पर खड़े साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वरोतोलन किया। आर्थिक-राजनैतिक केन्द्रीकरण द्वारा हो रहे शोषण की मुखालफत के साथ उपनिवेशवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप आधुनिक राष्ट्रवाद की भावना का उदय (फ्रान्स, रूस, चीन आदि देशों में जनक्रान्ति के फलस्वरूप स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व के नारे के साथ नयी विचारधारा उभरी – समाजवाद( अधिकांश ऐसे राष्ट्र जिन्होंने औद्योगीकरण, उपनिवेशवाद और पूँजीवाद को पोषित किया, वहीं संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली का भी जन्म हुआ। आज तक पूँजीवाद और संसदीय लोकतंत्र साथ-साथ चल रहे हैं।

भारत में राष्ट्रवाद की एक विशेष परम्परा रही है। वह आज भी अपने विशिष्ट रूप में मौजूद है, स्वाभाविक ही इसमें क्षेत्रीयता के अलंकार अधिक हैं। विकेन्द्रीकरण के सिद्धान्त को आधा-अधूरा समझने वाले सज्जन राष्ट्रीयता के सवाल पर हमेशा गड़बड़ा जाते हैं। 15 अगस्त, 1947 को हुए सत्ता हस्तान्तरण के बाद एक झण्डा, एक सेना, एक संसद, एक संविधान, एक करंसी, वाली संघीय शासन प्रणाली को एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र (राष्ट्र-राज्य) भारत में कायम रखा गया। भारत में आधुनिक राष्ट्रीयता का उदय बरतानिया साम्राज्यवाद से संघर्ष के दौरान ही हुआ था। हालांकि संघर्ष फिरंगियों से था, अन्ततोगत्वा वह केन्द्रित शासन का ही विरोध था। सत्ता हस्तान्तरण के बाद आधुनिक राष्ट्रीयता और केन्द्रीकरण का बेमेल विवाह कराते हुए संविधान में राष्ट्र की एकता और अखण्डता को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया गया। गुलाम मानसिकता वाले लोगों ने ऐसा किया, जिन्होंने पिछले पाँच हज़ार वर्षों से बहती आ रही सांस्कृतिक संश्लेषण की स्वतःस्फूर्त धारा को गतिशून्य कर दिया। वर्तमान व्यवस्था और मानस में राष्ट्रीयता तथा केन्द्रीकरण के कारण एक ऐसी उलझन पैदा हो गई है, जिसके चलते भारत के संविधान में घोषित आदर्श – सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय – कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।

भारतीय जनता केन्द्रित शासन को कभी भी लम्बे समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकी है। छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरू तेगबहादुर आदि बहुत से क्षेत्रीय नेता रहे हैं, जिन्होंने दिल्ली शासन की अधीनता में रहना स्वीकार नहीं किया। वर्तमान सन्दर्भ में यदि दिल्ली शासन को अस्वीकार करना अलगाववाद है तो उक्त नेता भी अवश्य ही अलगाववादी रहे हैं, जबकि पाठ्यपुस्तकों में उन्हें राष्ट्रीय नायक बताया जाता रहा है।

अतः राष्ट्रीयता को एकता और अखण्डता के चश्मे से देखने के बदले सांस्कृतिक अस्मिता की रोशनी में देखना उपयुक्त होगा। तभी हम इतिहास का सार्थक विश्लेषण करते हुए वर्तमान में किसी व्यावहारिक समाधान तक पहुँच सकेंगे। जिसे आज हम भारत संघ कहते हैं उसमें प्रत्येक क्षेत्र में अपनी विशेष सांस्कृतिक परम्परा रही है। भाषा, आहार, वेशभूषा, सामाजिक मान्यताओं आदि में आकाश-पाताल का अन्तर होते हुए भी सदियों से इनमें परस्पर आदान-प्रदान होते रहा है। परस्पर हितों में विरोधाभास उत्पन्न होने पर संघर्ष हुए हैं, फिर 1947 के बाद यह कैसे मान लिया गया कि प्रक्रिया रुक गयी है (या रुक जानी चाहिए)? यह भ्रम उन बुद्धिजीवियों ने फैलाया है, जिन्होंने पिश्चम को आधुनिक और विकसित मान रखा है। यह वही गुलाम मानसिकता है, जो प्रचार करती है कि केन्द्रित शासन ही एकमात्र व्यावहारिक पद्धति है, जिसके माध्यम से मानव समाज विकास कर सकता है, वरना चारों ओर अराजकता फैल जाएगी।

फिरंगियों को भारत की प्राकृतिक सम्पत्ति का शोषण करते हुए, भारतीय प्रजा को बाजार बनाना था। इस उद्देश्य से इसे एक राजनैतिक इकाई (राष्ट्र-राज्य) का रूप दिया गया। भारतीय जन मानस में पराधीनता तथा सांस्कृतिक अस्मिता के गौरव की रक्षा की अभिलाषा भी निहित थी। स्वतंत्रता संग्राम के उत्तरकाल में बहुत से नेताओं ने इस बात को समझा था। कहा जा सकता है कि मोहनदास करमचन्द गांधी ने जनता की यह नब्ज थामी थी, तभी उन्होंने स्वदेशी और स्वावलम्बन के साथ-साथ विकेन्द्रीकरण को भी बहुत ज़्यादा महत्व दिया। उत्पादन के साधनों के विकेन्द्रीकरण के बारे में कार्ल मार्क्स की विचारधारा के समानान्तर ही गांधी जी ने आर्थिक-राजनैतिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बात की, परन्तु सन् 1947 के बाद जो सत्ताधीश रहे, उन्होंने इसके लिए कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया। इसकी स्वाभाविक परिणति उन आन्दोलनों के रूप में हुई, जिन्हें अलगाववादी आन्दोलन कहा जा रहा है। अपने राजनैतिक और आर्थिक अधिकार और सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखने के लिए ही इन आन्दोलनों का जन्म हुआ है।

अतः इन्हें इसी सन्दर्भ देखना होगा। इनका समाधान भी इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखे बगैर असम्भव है। जब तक आर्थिक और राजनैतिक सत्ता का पूर्णरूपेण वास्तविक विकेन्द्रीकरण नहीं होता और क्षेत्रीय सांस्कृतिक अस्मिता को स-सन्मान सुरक्षा की गारण्टी नहीं मिलती, तब तक ऐसे आन्दोलन जीवित रहेंगे। इन्हें सैनिक अभियान या आर्थिक पैकेज या थोड़ी राजनैतिक स्वायत्तता का दाना डालकर कुछ समय के लिए मौन तो किया जा सकता है, किन्तु इसे समाधान समझ लेना भूल है।

यह प्रविष्टि सम्पादकीय में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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