एक जीवन ऐसा भी

जीने की राह

अगस्‍त 2009

व्यावसायिकता के इस युग में ऐसा परिवार मिलना कल्पनातीत है जो अपना सब कुछ साझा करने को तत्पर हो। विदर्भ में निवास कर रहे `मेश्राम दम्पति´ का जीवन आधुनिक समाज की वस्तुपरकता को नकारते हुए सही अर्थो में मानवतावादी दृष्टिकोण की वकालत करता है। उनके जीवन का आधार `प्रेम´ और `भरोसा´ है। आदशZ जीवन शैली का रेखांकित करता एक संग्रहणीय आलेख।

जिस सुबह मैं अनुसूयाबाई मेश्राम से मिलने गई उस समय वह कुछ ऐसा कर रही थी जो कि वह सामान्यतया नहीं करती, वह अपनी गाय का दूध दुह रही थी। आज खास दिन था क्योंकि मेहमान आ रह थे। उसने हमें चाय देते हुए खुशी-खुशी बताया कि हम रोज दूध नहीं दुहते क्योंकि हम तो बिना दूध की चाय पीते हैं। और भी बहुत सी चीजें हैं जिनकी 44 वषीZय अनुसूयाबाई और उसके 47 वर्षीय पति पाण्डुरंग मेश्राम को आवश्यकता नहीं है। जैसे – बिजली, नल का पानी, सुरक्षा, पक्का मकान, निरन्तर सामाजिक सम्पर्क, और सबसे बढ़कर हमेशा धन की आवश्यकता ! पिछले 8 साल से महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के वारसीफोडे गाँव के बाहर रह रहे यह दम्पति अपनी मर्जी से उपरोक्त सुविधाओं के बिना अपनी नैतृक भूमि पर रह रहे है।

अपने पैतृक गाँव वारिसफोडे में बसने के पूर्व पाण्डुरंग ड्रायवर और मैकेनिक के कार्य अलावा मछली मारने का कार्य भी कर चुके थे। परन्तु दोनों खुश नहीं थे। अब इस साधारण जीवन की खुशी उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती है। पाण्डुरंग का कहना है, हम इस तरह इसलिए रह रहे हैं क्योंकि हमें यह अच्छा लगता है। दो साल पहले हमने अपनी एकमात्र बेटी मनीषा की शादी कर अपने माँ-पिता होने का दायित्व भी पूरा कर दिया। पाण्डुरंग का कहना है कि हम हमेशा किसी न किसी बात को लेकर चिन्तित रहते थे, खासकर धन और बढ़ती कीमतों को लेकर। अन्तत: हमने तय किया कि हम अपने पैतृक निवास पर लौट चलें और बिना किसी चिन्ता के अपना अन्‍न स्वयं उपजाएं।

पिछले आठ वर्षों में मेश्राम दम्पति ने जो जीवन पद्धति अपनाई है उसमें न्यूनतम धन की आवश्यकता पड़ती है। वे अपने 7 एकड़ के खेत में से तीन एकड़ में कपास लगाते हैं और बाकी में ज्वार, बाजरा, विभिé किस्म की फलियाँ, सब्जी, तिलहन और मसाले उगाते हैं। कपास की देशी किस्म उन्हें 40 हजार रू. प्रतिवर्ष तक दे देती है, जिससे वे गेहूँ चावल, कपडे़ और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के अलावा सामाजिक कर्तव्य जैसे परिवार में शादी आदि में खर्च करते हैं। इतना ही नहीं, इसमें से कुछ बचत भी हो जाती है। अनुसुयाबाई का कहना है – ‘हमें तम्बाकू और शराब जैसे नशे पर खर्च की जरूरत नहीं है और न ही चिकित्सक के पास जाने की।’

आस-पास में आने-जाने के लिए उनके पास सायकल है, जिस पर वे दिन में 20-25 कि.मी. तक का सफर कर लेते है। हाँ, हर महीने 75 कि.मी. दूर स्थित माहुर तीर्थ में जाने के लिए वे यातायात के किसी अन्य साधन का इस्तेमाल करते है। अपनी भूमि पर स्थित पेड़ों से उन्हें उनकी आवश्यता की जलाऊ लकड़ी भी मिल जाती है। वे अपनी जरूरत के मुताबिक फसल काटकर बाकी की फसल खेत में ही छोड़ देते है। जिसे अन्य जरूरतमन्द ले जाते हैं। दम्पति का कहना है कि उन्हें कभी भी खाद्य पदार्थों की कमी नहीं हुई, जबकि वे लगाई हुई फसल का आधा ही काटते हैं। यह पूछने पर कि वह अतिरिक्त फसल को बेचने के बारे में नहीं सोचतेर्षोर्षो बिना पलक झपकाए उन्होने कहा, ‘हाँ, परन्तु इससे समस्या पैदा होगी।’

इन तरह के सवाल पूछने पर कि वे बिजली का खर्च वहन कर सकते हैं तो भी कनेक्शन क्यों नहीं लेते ? अपनी नौ गायों का दूध बेचकर वे कमाई में इजाफा क्यों नहीं करते ? सरकारी सबसिडी का लाभ क्यों नहीं उठाते ? अपना धन बैंक में क्यों नहीं रखते ? – जवाब देने के बजाए वे चुप हो गए।

इन सभी जटिल प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए पाण्डुरंग की थोड़ी खुशामद करनी पडी़। अन्तत: उन्होंने उत्तर दिया – “देखिए अगर हम बिजली का कनेक्शन लेंगे, तो उसके बिल के भुगतान के लिए हमें अतिरिक्त कमाना पड़ेगा और पावर कट के कारण झुंझलाहट अलग से होगी। अगर मैं अपने अतिरिक्त उत्पाद को बाजार में बेचूंगा, तो इसके लिए मुझे अलग से समय देना होगा परिणामस्वरूप मैं अपनी जमीन और जानवरों पर कम ध्यान दे पाऊँगा और सबसिडी का अर्थ है सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देना।” मन को छू जाने वाली कोमलता से उन्होंने कहा “हमारे पास देने के लिए भी कुछ हैं। गाँव वाले हमारे खेत से हमेशा सब्जी और मूँग ले जाते हैं। सब हम पर भरोसा करते हैं और हम सब पर।” इस दम्पति के जीवन का दर्शन है `प्यार और भरोसा।´

क्षेत्र में कार्य कर रही गैर-सरकारी संस्था धरामित्र की सुचेता इंगोले कहती हैं, “कुत्ते, बिल्ली और पालतू जानवर उनके खेत में मिलजुल कर रहते हैं। इतनी ही नहीं घायल जंगली जानवर भी यहाँ शरण पाते हैं।” वहीं अनुसूयाबाई का कहना है, “हम सभी तरह के काम करते हैं और खेती के काम में हमें एक दिन में तीन घण्टे से ज्यादा नहीं देना पड़ता।”

इंगोले का कहना है “शुरू में हमने इन्हें वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद), वर्मी वाश व जैविक कीटनाशक तैयार करने की तकनीक सिखाई थी। परन्तु एक-दो सालों के बाद इन्होंने अपने जानवरों को खेत में स्थित नीम के पेड़ों के नीचे बान्धना प्रारम्भ कर दिया। पेड़ के नीचे गिरती पत्तियों, गोबर, मूत्र और चारे के इकट्ठा होने से सर्वश्रेष्ठ कीटनाशक मिश्रित खाद स्वमेव तैयार हो गई। मैने आज तक नहीं सुना कि इनकी फसल खराब हुई हो या उसमें कीड़े लगे हों।”

असाधारण सरलता उनके आर्थिक लेन-देन में भी झलकती है। मेश्राम दम्पति अपना धन बैंक के बजाए एक भरोसेमन्द साहूकार के पास रखते हैं। वैसे तो उनकी अधिकांश बचत रिश्तेदारों की मदद में ही चली जाती है। पिछले दो सालों से वो अपने मिट्टी के कवेलू के घर को दुबारा बनाने की योजना बना रहे हैं परन्तु जरूरतमन्द रिश्तेदारों को मदद दे देने के कारण वे अपना घर नहीं बना पा रहे हैं। इसके बावजूद प्रफुल्लित अनुसूयाबाई कहती हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम तो अपने जानवरों के साथ खुले में रहने के आदी हैं। जब लोग हमारा पैसा वापस कर देगें तब हम अपना घर पुन: बना लेंगे।

मेश्राम दम्पति को अपनी इस आत्मनिर्भर जीवनशैली पर न तो कोई अविश्वास है न कोई डर। वे कहते हैं “अगर आप जमीन से प्रेम करते हैं, तो वह प्रचुर मात्रा में देती हैं। जब आप पेड़ों और जानवरों से प्रेम करते हैं तो वे भी आपसे प्रेम करते हैं। जीने के लिए और क्या चाहिए ?”

वास्तव में कुछ और चाहिए ही नहीं।

(सप्रेस/सीएसई, डाइन टू अर्थ फीचर्स)

यह प्रविष्टि जीने की राह में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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