शहीद स्मरण : पुष्पांजलि से आगे …

मार्च 2009

मार्च आते ही भगत सिंह याद आते हैं। 23 मार्च 1930 को लाहौर सेण्ट्रल जेल में उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी दे दी गई थी। आजादी की लड़ाई में भाग लेने वाले क्रान्तिकारियों में वे सिरमौर हैं और उनकी शहादत को आज भी बड़े सम्मान से याद किया जाता है। उनकी तस्वीरें भी जगह-जगह नज़र आती हैं।

उनका जन्म 27 सितम्बर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के खटकर कलाँ में एक राष्ट्रभक्त सिख-जाट परिवार में हुआ था। उनके दादाजी, जिन्होंने उनका नाम `भगत´ रखा – अर्जुन सिंह – आर्य समाजी थे। उस दौर में आर्य समाज में शामिल होना ही अपने आप में एक क्रान्तिकारी कार्य हुआ करता था। भगत सिंह के दोनों चाचाओं – आजीत सिंह और स्वर्ण सिंह – के साथ-साथ उनके पिता किशन सिंह भी गदर पार्टी से जुड़े थे। भारत में सरकार पीछे पड़ने की वजह से चाचा अजीत सिंह को कुछ समय के लिए पर्शिया (इरान) में शरण लेनी पड़ी थी। काकोरी काण्ड में शामिल होने के जुर्म में चाचा स्वर्ण सिंह को 19 दिसम्बर 1927 को फाँसी दी गई थी।

तत्कालीन सिखों के विपरीत दादा अर्जुन सिंह ने अपने भगतू को लाहौर के अंग्रेज परस्त खालसा स्कूल न भेज कर आर्य समाज के `दयानन्द एंग्लो वैदिक स्कूल´ में पढ़ने भेजा। भगत सिंह की राजनीतिक जीवन की शुरुआत 13 साल की उम्र में हुई, जब वे गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में शामिल हुए। स्वदेशी के आन्हान को स्वीकार करते हुए उन्होंने अपनी सरकारी पाठ्यपुस्तकें और विदेशी कपड़ों को आग के हवाले कर दिया था। चौरी चौरा काण्ड के बाद जब गांधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के अनेक नौजवानों की तरह भगत सिंह भी बहुत निराश हुए थे।

पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन की एक निबन्ध प्रतियोगिता को जीत कर भगत सिंह ने अपनी पहचान बनाई और पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के महासचिव प्रो. भीम सेन विद्यालंकार के निकट सम्पर्क में आए। यहाँ से उनके अध्ययन का जो सिलसिला शुरू हुआ वह फाँसी के दिन तक चलते रहा। साहित्य से शुरू हुआ यह अध्ययन आगे चलकर दुनिया भर की क्रन्तियों के इतिहास से होते हुए गम्भीर वैचारिक-दार्शनिक अध्ययन तक जा पहुँचा।

अफसोस की बात है कि भगत सिंह के बारे हम आमतौर पर यही जानते हैं कि वे भावना के प्रबल देशभक्त थे और उन्होंने हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे को गले लगाया था। कुछ लोग यह भी जानते हैं कि लाला लाजपत राय पर हुए हमले को राष्ट्र का अपमान मानते हुए साण्डर्स की हत्या कर उसका बदला लिया था और उन्होंने असेम्बली में बम भी फेंका था। बस! हममें से बहुत से वयस्क ना तो यह जानते ना ही अपने बच्चें को बताते हैं कि भगत सिंह नीरे भावुक देशभक्त ही नहीं, वरन् वैज्ञानिक समाजवाद, मार्क्सवाद और क्रन्ति के इतिहास के विशारद् भी थे। अपने अन्तिम दिनों में वे स्वतंत्र भारत के निर्माण पर मनन करने के साथ-साथ विश्व के तत्कालीन इतिहास का गहन अध्ययन भी कर रहे थे। उनकी जेल डायरी इस बारे में काफी कुछ बताती है।

भगत सिंह की कुर्वानी का गुणगान करने के साथ ही हम उनके लेखन को क्‍यों नहीं खंगालते? क्यों नहीं हम देखते कि वे अपने समय में क्या कह-लिख रहे थे? बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में शहीदों की संक्षिप्त जीवनी के साथ क्या उनके पत्र, लेख आदि नहीं दे सकते। क्यों नहीं हम सीधे भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, आम्बेडकर, गांधी आदि से प्रत्यक्ष रूबरू होते? क्यों हम उन तक पहुँचने के लिए कोई पुल, कोई अप्रत्यक्ष मार्ग तलाशते हैं?

इस दृष्टि को ध्यान में रखकर ही आन्तर भारती इस अंक में यह विनम्र प्रयास कर रहा है कि आप सीधे भगत सिंह से मुख़तिब हों। हम आपके लिए उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ लेकर आए हैं। आशा है कि भगत सिंह से आपका प्रत्यक्ष परिचय होने में इससे मदद मिलेगी। यह सामग्री हमने परिकल्पना प्रकाशन के संग्रह `भगत सिंह और उनके साथियों के सभी उपलब्ध दस्तावेज´ से लिए हैं। इस विशेषांक में हम कुछ नियमित स्तम्भ नहीं दे पा रहें है। इसके लिए क्षमा चाहते हैं। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा रहेगी।

शुभकामना

यह प्रविष्टि सम्पादकीय में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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