मुम्बई के बाद

दिसम्बर 2008

 

(एक)

मुम्बई पर हुए आतंकी आक्रमण पर इतना कुछ लिखा, कहा और दिखाया जा चुका है कि उस पर आन्तर भारती के सम्पादकीय में लिखने को कुछ विशेष शेष नहीं रहा। हमने उस घटना को सपरिवार या मित्र-मण्डली के साथ खाते-पीते बैठकर या लेटकर टीवी पर `लाईव´ देखा, इसलिए घटना पर कुछ भी कहने को बाकी नहीं बचा। आतंकी कौन थे ? कहाँ से आए थे ? उनका मकसद क्या था ? वगैराह बातें गली-मुहल्ले के नुक्कड़ों पर, चाय-पान के ठेलों-गुमटियों से लेकर टीवी पर आयोजित-प्रायोजित बहसों का मुद्दा रही हैं।

इस घटना की इतनी बखिया उधेड़ी जा चुकी है कि सारा मामला तार-तार हो चुका है। विविध गुप्तचर एजेंसियों की नाकामी, सरकारों की अकर्मण्यता, सूचना तंत्र की विफलता, हमले का सामना करने में पुलिस की अकुशलता और अनजान-गुमनाम-नामालूम किस्म के आतंकियों से निपटने के लिए भारतीय सेना के श्रेष्ठतम कमाण्डो को आगे करने के मजबूरी, आदि अब किसी से छिपी नहीं है। घटना की निन्दा की भी इन्तेहाँ हो चुकी है। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री-मण्डल, विपक्ष, सांसदगण, तमाम प्रदेशों के राजनेता, अभिनेता, प्रबुद्धजन, सामाजिक-सांस्कृति संगठन सभी उपलब्ध मंचों से सरकार, प्रशासन, पुलिस, गुप्तचर एजेंसी और यहाँ तक कि मीडिया, पड़ोसी देश और अमरीका तक को कोस चुके हैं।

गेटवे ऑफ इण्डिया और होटल ताज के सामने जो स्वत:स्फूर्त जो जमावड़ा हुआ वह घटना पर प्रतिक्रिया की पराकाष्ठा थी। इसके बाद कहने सुनने को कुछ बाकी नहीं बचता…. बचता है, बहुत कुछ बचता है…. करने को…. और उससे पहले सोचने को…. क्या हम उसके लिए तैयार हैं? आतंकी युद्ध नई शैली का गुरिल्ला युद्ध है – हाँ, यह `युद्ध´ है, कोई `घटना´ नहीं। आंकवादियों का कोई राष्ट्र नहीं है। लेकिन वे किसी राष्ट्र के खिलाफ और किसी विचारधारा या जीवनशैली या धर्म या आस्था के खिलाफ लड़ रहे हैं। वे मानते हैं कि उनकी अपनी एक विचारधारा है, धर्म है, आस्था है।

युद्ध जारी है, इसका मतलब है कि अन्तिम निर्णय नहीं हुआ है, कहीं असहमति है – विचारों को लेकर, जीवनशैली को लेकर, धर्म और आस्था को लेकर। क्या सही है, क्या गलत – यह सोचने वाले के अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यह `दृष्टिकोण´ बनता है – विचार, जीवनशैली, धर्म और आस्था के आधार पर। विविधता का अर्थ विरोधाभास नहीं होता।

याद करें 11 सितम्बर के हमले के बाद जॉर्ज बुश की चेतावनी – “जो हमारे साथ हैं वो हमारे दोस्त हैं, जो हमारे साथ नहीं वे हमारे दुश्मन हैं…. और हम उन्हें सबक सिखा कर रहेंगे।´´ सन्देश साफ था – आतंक के खिलाफ तथाकथित युद्ध में अगर आप अमरीका के साथ नहीं है तो इसका अर्थ है कि आप अमरीका के दुश्मन हैं। तटस्थता, मत भिन्‍नता के लिए कोई अवकाश नहीं !

इसी के समानान्तर अपने आसपास देखिए – हिन्दुस्तान हिन्दुओं की धरती है, यहाँ केवल हिन्दु रहेंगे ! इस तरह के जुमले क्या सन्देश देते हैं ? विचार और आस्था की विविधता के लिए क्या अब कोई स्थान नहीं बचा ? अगर व्यवस्था इतनी असहिष्णु हो गई है तो भिन्‍न मतावलम्बी कहाँ जाएँ ? वैचारिक या आस्थागत भिन्‍नता के लिए सामाजिक-राजनीतिक अवकाश कहाँ तलाशें ? सही है हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है और हिंसा का रास्ता अपनाना ना तो नैतिक दृष्टि से और न ही नीतिगत रूप से सही है। इसका पूरजोर विरोध होना चाहिए। बेगुनाहों को मौत कि घाट उतारने वाले को वहशी ही कहा जा सकता है और उसपर किसी प्रकार की दया की जरूरत नहीं। कानून उसे जितनी कठोर सजा दे सकता है, वह उसे मिलनी चाहिए।

लेकिन सभ्य समाज में यह मौका जरूर होना चाहिए कि प्रत्येक समस्या के समाधान की राह खोजने वाले के लिए अपनी बात और पीड़ा व्यक्त करने का अवकाश रहे। यह मौका हथियार उठा चुके व्यक्तियों/समूहों के लिए भी होना चाहिए। आज यह प्रश्न बहुत बड़ा है कि क्या वह मौका अब भी बचा है ? क्या हममें एक व्यक्ति के रूप में और एक राष्ट्र के रूप में विविधता का सम्मान करने की वह सहिष्णुता बची है या नहीं ? अगर नहीं बची है तो हम आतंकवाद को बढ़ाने वाले ही सिद्ध होंगे और आतंकवाद की विजय होगी क्योंकि यही असहिष्णुता तो आतंकवाद का आधार है।

(दो)

आतंकवाद के बहाने आमजन राजनेताओं की मुखालफत में सड़क पर उतर आया। यह आम धारणा है कि राजनेता जनता से सरोकार नही रखते सिर्फ अपनी तिजोरी भरने में लगे रहते हैं, भ्रष्ट हैं, नकारा है। मामला इसलिए गम्भीर बना क्योंकि देश का, विशेषत: मुम्बई का सम्भ्रान्त वर्ग मोमबत्तियाँ लेकर सड़क पर उतरा। ये मोमबत्तियाँ प्रतीक थीं कि अब व्यवस्था में फैले अन्धकार को दूर करना है, और साथ ही अपने दिलों में छाए सूनेपन के अन्धियारे को भी दूर भगाना है।

प्रतीक तो मुम्बई पर हुआ आंतकी हमला भी था। ताज और ऑबेराय, नरीमन बिल्डिंग ये भी तो प्रतीक हैं – भारत के सम्भ्रान्त वर्ग के। मुम्बई खुद भी भारत की अमीरी का प्रतीक है। यूँ तो हर आतंकी हमला किसी ना किसी प्रतीक पर ही होता है – संसद भवन, अक्षरधाम, अयोध्या और मालेगाँव। सभी किसी न किसी विशेष घटना-दुर्घटना-इतिहास-वर्तमान के प्रतीक ही तो हैं। प्रतीकों को समझना कठिन है। उनके सन्दर्भ व्यापक, बहुआयामी और छिपे हुए हो सकते हैं।

लेकिन इतना साफ है कि मीडिया और शासकवर्ग की नजर में कोई भी समस्या तभी ज्वलन्त बनती है जब हमला उस वर्ग पर होता है जो व्यवस्था से अधिकतम लाभ प्राप्त रहा है। मुम्बई भी तभी दहला जब अमीरों के आरामगाह पर, उनके मर्म पर हमला हुआ। उससे पूर्व कई बार राह चलते गुमनाम नागरिक बम धमाकों में मारे जा जुके हैं। `अब बहुत हो चुका´ की घोषणा तभी हुई ताज, ओबरॉय और नरीमन को निशाना बनाया गया। क्या यह इस बात का संकेत नहीं कि समूचा शासनतंत्र अमीरों का, अमीरों द्वारा और अमीरों के लिए चलाया जाने वाला तंत्र है। यह आम जन का कब और कैसे बनेगा ?

(तीन)

तकनीकी प्रगति का विरोध नहीं। तकनीक हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाती है, सुगम बनाती है, हमारी इन्द्रियों की क्षमताओं को असीमित करती हैं, अनेक दुश्कर और असम्भव कार्यों को सहज बनाती है – उसका स्वागत है।

टीवी पर 24 घण्टे चलने वाले समाचार चैनलों ने हमें अनेक बार वो सब दिखाया है जो हमारी संवेदना जगाने का माध्यम बना। बाढ़, तूफान, सुनामी, भूकम्प, भूस्खलन, किसी बच्चे का गहरे गड्ढे में गिरना जैसी घटनाओं को साक्षात् अपनी आँखों के सामने देखने के बाद कौन मनुष्य होगा जिसका हृदय द्रवित नहीं होगा ? कौन नहीं होगा जिसके हाथ सहायता के लिए आगे बढ़ने को तत्पर नहीं होंगे ? इस दृष्टि से समाचार चैनलों ने मानव जाति का अभूतपूर्व कल्याण किया है।

मगर मुम्बई हमले का लाईव प्रसारण अनेक सवाल खडे़ करता है। जिसमें एक सवाल बच्चों पर पड़ने वाला प्रभाव भी है। हममें से अनेक लोगों ने गौर किया होगा कि 26 नवम्बर के बाद से बच्चों के खिलौनों में बन्दूक की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। अब छिपने और ढूण्डने के खेल का स्वरूप भी बदल कर कमाण्डो ऑपरेशन की शक्ल अख्तियार कर चुका है। स्कूल में, मुहल्ले और आस-पडोस के बच्चों की आपसी बातचीत के विषय भी अब इससे अप्रभावित नहीं रहे।

बच्चों का मन कोमल होता है। इन घटनाओं से वे क्या शिक्षा लेते हैं इसका विश्लेषण मनोविज्ञानी और उसके समाज पर असर का आकलन समाजशास्त्री करते रहेंगे। मगर अभिभावकों और शिक्षकों को रोज ऐसे बच्चों के बीच और उनके सवालों के बीच दिन का अधिकांश समय बिताना होता है। वे क्या करें ? सवालों को नकारा नहीं जा सकता और ना ही उन्हें दबाया जाना चाहिए। आखिर हम ऐसी स्थिति क्यों पैदा करते हैं कि बच्चों को वह सब देखना पड़े जो उनके हित में नहीं है ? सभ्य समाज ने बच्चों के कुछ अधिकार तय किए हैं, जिसमें यह भी शामिल है कि उसने मानसिक-बौद्धिक विकास के लिए श्रेष्ठ परिवेश उन्हें उपलब्ध हो।

टीवी पर जलती इमारतें, गोलीबारी, बम धमाके, फर्श पर पसरा खून लाईव दिखा कर हम क्या हासिल करना चाहते हैं। और वह सब हम बच्चों को क्यों दिखाएँ। हमारे अधिकार, हमारी स्वतंत्रता और हमारे सरोकार के केन्द्र में बच्चे क्यों नहीं हैं ? उनके अधिकार, उनकी स्वतंत्रता और उनके सरोकारों की सुध कौन लेगा ?

(चार)

सभी जानते हैं कि आज जो आन्तर भारती नाम का संगठन अपनी थोडी-सी ताकत, थोड़े-बहुत संसाधन और गिने-चुने कार्यकर्ताओं के साहस के दम पर खड़ा है, वह साने गुरूजी के एक सपने को सकार करने की जद्दोजहद है। एक आदर्श शिक्षक, एक सहृदय साहित्यकार, एक जूझारू स्वतंत्रता सैनिक, एक समर्पित सामाजिक कार्यकार्ता और एक ऐसे शख्स का सपना हम आन्तर भारती के रूप में जीने की कोशिश कर रहे हैं, जिसने अपनी माँ की मृत्यु के बाद मातृभूमि को ही माता माना था।

क्या है आन्तर भारती ? भारत को आर्न्‍तमन से एक करने/रखने की कोशिश। विविधताओं को विरोधाभासी न बनने देना, भिन्‍नता – विचार, धर्म, भाषा, अस्था की भिन्‍नता – का सम्मान करते हुए उन्हें अलग-अलग रूप और गंध के फूलों की तरह एक माला में पिरोना। राष्ट्र की एकता में जनता की आत्मा को समाहित कर राष्ट्रीय एकात्मता स्थापित करने का मिशन साने गुरूजी ने आन्तर भारती को दिया था।

मुम्बई हमलों के बाद जब परस्पर अविश्वास, समाज और सरकार के प्रति असन्तोष और व्यवस्था के साथ-साथ राजनेताओं और न जाने किस-किस के प्रति आक्रोश चरम पर है, तब आन्तर भारती की भूमिका क्या है ? अपनी सुन्दर पुस्तक `भारतीय संस्कृति´ में जिस सहिष्णुता की मिसालें बार-बार साने गुरूजी दे रहे हैं, उस सहिष्णुता को एक बार फिर साकार करने की जरूरत है। अपनी सर्व-सामावेशी विरासत की वजह से आन्तर भारती स्वाभाविक रूप से समाज के सभी वर्गों में परस्पर विश्वास पुन: कायम करने में अपना योगदान दे सकता है। आन्तर भारती युवाओं और बच्चों के बीच लगातर काम करता रहा है। हम विविध गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को यह सन्देश दे सकता है राजनेताओं का विरोध लोकतंत्र का विरोध न बनने पाए। यह देश केवल अमीरों का ही नहीं है, हर मेहनतकश, हर कारीगर और हर भारतीय का यह देश है और सुरक्षा समेत तमाम सुविधाएँ सभी भारतीयों को समान रूप से मिलनी चाहिए। एक समझदार नागरिक के रूप में हम सरकार से अधिकार मांगने के लिए दबाव डालने कि साथ-साथ अपने नागरिक कर्तव्यों को भी पूरा करें।

हम प्रदर्शनी, यात्रा, कहानियों आदि के माध्यम से बच्चों को बता सकते हैं कि जीवन का एकमात्र सत्य युद्ध नहीं, वरन् सहयोग, सामंजस्य और सौहार्द है। जब समाज में टूटन बढ़ रही है तो आन्तर भारती की भूमिका अधिक प्रासंगिक हो जाती है। हमें एक बार फिर देश और समाज के प्रति अपने संकल्प को दोहरा कर काम में जुट जाना होगा। अभी बहुत काम बाकी है….

यह प्रविष्टि सम्पादकीय में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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