न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए वेतन-वृद्धि पर रोक जरूरी

मई 2009

– विवेकानन्द माथने

निजी कम्पनियों एवं शासकीय कर्मचारियों की वेतन-वृद्धि के गम्भीर परिणामों का जो लोग अनुमान लगा रहे हैं, वे ही इस वेतन-वृद्धि से लाभान्‍वित होने वाले हैं, इसलिए वे इस विषय पर मुँह नहीं खोलना चाहते। जिन लोगों पर इस वेतन-वृद्धि का विपरीत परिणाम पड़ने वाला है,उनकी तादाद अधिक होने के बावजूद अपना पेट भरने का जुगाड़ करने में ही उन्हें इतना समय और श्रम खपाना पड़ता है कि वे इस वेतन-वृद्धि का सम्बन्ध अपनी इस दुरावस्था से नहीं जोड़ सकते।

वेतन-वृद्धि की पृष्‍टभूमि और उसके गम्भीर परिणामों का आकलन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि गरीबी में जैसे-तैसे गुजर करने वाला बहुसंख्य वर्ग ही एक बड़े षडयंत्र का शिकार हो गया है। यह बात सर्वसामान्य श्रमजीवी वर्ग के समझ में आ गई तो इसमें सन्देह नहीं कि ये लोग भड़क उठेंगे। साफ दिख रहा है कि अब वह समय पास आ रहा है। छठे वेतन आयोग के कारण सरकार के खजाने पर केन्द्र सरकार के 50 लाख कर्मचारियों के वेतन के लिए प्रतिवर्ष 22 हजार करोड़ रुपये, महाराष्ट्र राज्य शासन के 15 लाख कर्मचारियों के वेतन के लिए प्रतिवर्ष 9 हजार करोड रुपये और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के तहत होने वाली वेतन-वृद्धि के कारण प्रतिवर्ष 9 हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ने वाला है। महाराष्ट्र के साथ-साथ देश के सभी राज्यों एवं सरकारी, अर्ध-सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के बढ़ते वेतन के कारण राष्ट्र के खजाने पर हर साल 1.5 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा का बोझ बढ़ेगा। इसके अलावा प्रत्येक 10 साल के बाद नए वेतन आयोग के कारण लगातार होने वाली वेतन-वृद्धि तो निश्चित है ही।

इस वेतन-वृद्धि के समर्थन में दो मुख्य कारण गिनाये जाते हैं। एक तो यह कि बढ़ती महंगाई के कारण कर्मचारियों को अपनी ऊँची जीवन-शैली कायम रखने के लिए वेतन में वृद्धि करना आवश्यक है। और दूसरा कारण यह कि निजी कम्पनियों की तुलना में सरकारी कर्मचारियों को अगर आकर्षक वेतन नहीं दियाए तो ‘कुशल व्यक्ति’ दूसरी तरफ चले जाएगा और उससे उसके ‘कौशल’ का उपयोग सरकार नहीं कर सकेगी। इन दोनों कारणों के आधार पर ही बहुत अधिक वेतन लेने वालेए सुविधासम्‍पन्‍न वर्ग का ही वेतन बढ़ रहा है। यही वर्ग है जिसके पास एक या एक से ज्यादा घर हैं, दो पहिया और चार पहिया वाहन हैं, इन्हीं के बैंक लॉकरों में सोना है और बड़ी नकदी जमा है, बच्चों को उच्च शिक्षा देने और आधुनिक सुविधाओं से सज्जित सितारा अस्पतालों में इलाज खरीदने की क्षमता भी इन्हीं के पास है।

निजी कम्पनियों के बारे में विचार करें तो हम पाएंगे कि कम्पनियों को मुनाफा कमाने की असीम छूट मिली हुई है, इस वजह से ग्राहकों की लूट के दम पर ही ये कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों-अधिकारियों को ज्यादा वेतन दे पाती हैं। कम्पनियों में दिये जाने वाले वेतन का भी जुआ भी अन्तत: ग्राहकों के ही कन्धे पर रखा जाता है। किसानों को जीने मात्र के लिए उचित मजदूरी के आधार पर कृषि-उपज की योग्य कीमत नहीं देने वाले शासनकर्ता निजी कम्पनियों को उनके उत्पादन पर लिया जाने वाला मुनाफा और कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन के मामले मे कोई हस्तक्षेप न करते हुए ग्राहकों की लूट की उन्हें खुली छूट दे रखी है। सरकार के इस कम्पनी हित की भूमिका के कारण निजी कम्पनियों में सिर्फ वेतन के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये अनावश्यक रूप से दिये जाते हैं।

एक तरफ निजी और सरकारी क्षेत्र में हो रही वेतन की असीमित वृद्धि है और इसके दम पर अमीर होने वाला आबादी का छोटा-सा समूह है, जबकि दूसरी तरफ देश में बढ़ती जा रही गरीबी इसके विषम परिणामों को सामने ला रही है।

सन् 2001 की जनगणना के अनुसार देश में 26 प्रतिशत, अर्थात लगभग 29 करोड़ लोग, गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मजबूर हैं, जिन्हें प्रतिदिन 11 रुपये से भी कम आय हो पाती है। केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त डॉ. अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रपट के अनुसार 77 प्रतिशत, यानी 83.6 करोड़, लोगों की आमदनी प्रतिदिन 20 रूपये से कम है, जिनमें 85 प्रतिशत दलित, आदिवासी, मुस्लिम एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का हिस्सा है। इस रपट से प्रमाणित होता है कि सरकार की आर्थिक नीति का परिणाम विकास न होकर गरीबी और विषमता की प्रचण्ड वृद्धि है।

अगर मेहनतकश लोगों के श्रम और कौशल का उपयोग देश के हित में करना है तो उन्हें दो जून की रोटी, तन ढंकने भर को कपड़े, सर छिपाने भर को मकान, उनके बच्चों को समुचित शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा की व्यवस्था सरकार को करनी होगी और सरकार को ऐसे मेहनतकशों को उत्पादन के साधनों के साथ-साथ रोजगार की गारण्टी भी देनी होगी। यह समझना होगा कि मेहनतकश लोगों का भी बुद्धिजीवियों जैसा ही दिल होता है और उनकी भावनात्मक एवं भौतिक जरूरतें भी एक जैसी ही होती हैं। यह ध्यान में रख कर उनकी मेहनत की कीमत दी जानी चाहिए। मेहनताना देते समय सिद्धान्त: बुद्धि और श्रम का भेद मिटना चाहिए।

जो वर्ग खुद को बुद्धिजीवी मानकर समाज में रहता है, उनके सभी कार्यकलापों में क्या वास्तव में बुद्धि की जरूरत होती है? और अगर ये बुद्धिजीवी काम नहीं करेंगे तो क्या देश और समाज जी नहीं पाएगा? मेहनतकश लोगों ने अगर श्रम करना छोड़ दिया और किसानों ने अनाज उत्पादन बन्द कर दिया तो बुद्धि के भरोसे सारे देश का पेट भरेगा क्या? दुर्भाग्य से विकास के नाम पर आज तक जितनी भी योजनाएँ आयीं, उनमें अधिकांश योजनाओं ने इन मेहनतकशों को जीने के साधनों से वंचित किया है। उनके हाथ के काम छीने गये। इस तरह उन्हें विरासत में मिले कौशल को नकारा गया और उसके साथ-साथ उनके काम के वास्तविक मूल्य को भी नकारा गया है।

छठे वेतन आयोग के कारण देश के खजाने पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये का है। अगर उसकी दिशा मेहनतकश व्यक्तियों की तरफ मोड़ी गयी होतीए भीख के रूप में नहीं, वरन् उनका न्यायपूर्ण हक मानकर, तो इतने पैसों से 4 करोड़ परिवारों को और निजी कम्पनियों में दिये जाने वाले इतने ही अतिरिक्त वेतन से दूसरे 4 करोड़ परिवारों को भी गरीबी रेखा के ऊपर लाया जा सकता था। इस तरह देश की 48 करोड़ की आबादी को, जो कुल जनसंख्या का 44 प्रतिशत है, इंसानों की तरह जीने की अवस्था में लाया जा सकता था।

लेकिन ये राजनेता और नौकरशाह आम जनता के साथ एक घिनौना खेल खेल रहे हैं। सकल राष्ट्रीय उत्पाद का हिस्सा समान रूप से देना तय होने पर शासनकर्ताओं की पहली प्राथमिकता भूखे इंसानों को पेट भरने की होती है। लेकिन ऐसा करने के बदले देश के आर्थिक रूप से सम्पन्‍न ऊपरी तबके के 20 से 25 प्रतिशत लोगों की ओर ही यह उत्पादन भेजा जा रहा है।

छठे वेतन आयोग के माध्यम से कराई गयी यह वेतन-वृद्धि दरअसल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और शासकवर्ग की एक मिली-जुली साजिश है, जिससे उपभोक्ता और विलासिता के उत्पादों को नया और अधिक व्यापक बाजार मिल सके। न्यायपूर्ण तरीके से अगर सरकारी कोष का बंटवारा किया जाता तो उच्च क्रयशक्ति से सम्पन्‍न मुट्ठीभर लोगों का वर्ग बनता ही नहीं और ना ही इस वर्ग की उपभोक्तावादी व विलासितापूर्ण आवश्यकताएँ पूरी करने वाले उत्पाद ही बाजार में बेचे जा सकते थे। इसी आधार पर गरीबों को गरीब बनाए रख कर मुट्ठीभर लोगों की अमीर दुनिया बनाई जा रही है। हाल ही में किए गये अनेक सर्वेक्षणों का यह एकमत निश्कर्ष है कि छठे वेतन आयोग का पैसा हाथ में आने के बाद उसका उपयोग विलासिता के उत्पाद खरीदने में ही होगा।

भारत सरकार का सालाना शिक्षा बजट 25,000 करोड़ रुण्का है, महिला व बाल विकास का बजट 7,200 करोड़ रुण्ए सर्व शिक्षा अभियान का 13,100 करोड़ रु और ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का वार्षिक बजट 30,100 करोड़ रु का है। सत्ताधीश इस मनोभाव से ग्रस्त हैं कि इन योजनाओं पर किया जा रहा खर्च जनता पर बड़ा उपकार है। यह समझना जरुरी है कि अविवेकपूर्ण तरीके से बढ़े इस वेतन का पैसा अगर गाँवों की ओर भेजा जाता तो ग्रामीण भारत की दशा में काफी बदलाव लाया जा सकता था और समृद्ध-सम्पन्‍न ग्रामीण भारत के सपने को साकार करने की दिशा में कुछ ठोस कदम बढ़ाए जा सकते थे। ग्रामीण भारत में शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराने की माँग पूरी की जा सकती थी।

इतना ही नहीं, इस प्रकार की तमाम सुविधाएँ जनता को उपलब्ध कराने के नाम पर आमदनी के लिए चलने वाले शराब और तम्बाखू जैसे नशीले पदार्थों की बिक्री रोकी जा सकती थी। सिर्फ 2000 करोड़ रूपये के लिए किसानों के जीवन का आधार माने जाने वाले गाय-बैलों का कत्ल कर किए जाने वाला माँस निर्यात रोका जा सकता था। परिणामस्वरूप इससे होने वाले आर्थिकए सामाजिक, पर्यावरणीय एवं सांस्कृतिक दुष्परिणामों से देश को बचाया जा सकता था। लेकिन औद्योगिक घरानों, राजनेताओं और नौकरशाही की स्वार्थपूर्ति के लिए एक योजना के तहत यह सब अनदेखा किया जा रहा है।

भारत सरकार का सालाना रक्षा बजट लगभग 1,42,000 करोड़ रु है। लेकिन रक्षा की ज़रुरत किसे है, जिनका जीना मृत्यु से भयंकर और दुखदायी बनाया गया है, उन 77 प्रतिशत मेहनतकश मनुष्यों को रक्षा की ज़रुरत नहीं है। चाहे मेहनत करने वाला आदमी भारत का हो या पाकिस्तान काए सोमालिया-इथोपिया का हो या अमेरिका का, जिनके जीने के अधिकार पर ही आक्रमण किया गया है और जिनके लिये आज के मृतप्राय जीवन से बुरी स्थिति सम्भव ही नहीं, किसी भी राष्ट्र के शासकों ने इन पर शासन किया तो उससे इनकी स्थिति में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है, ऐसे समाज को अपने राष्ट्र की सरहद की रक्षा की ज़रूरत नहीं है। यह रक्षा बजट भी उन्हीं अनैतिक और भोगवादी जीवन जीने वाले मुट्ठीभर अमीरों के लिये है जिन्हें अनैतिक रास्ते से मिले धन और प्रतिष्ठा छिनने का हमेशा डर बना रहता है।

इस बात का जिनको अहसास नहीं है कि गरीबों के लिए मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए ऐशो-आराम से जीवन जीते रहना अनैतिक है, उनसे न्याय की अपेक्षा करना बेमानी है। अपने हक के लिए जनता को खुद ही लड़ना होगा, लेकिन आश्चर्य होता है कि इतना अन्याय होते हुए भी गरीब-बेरोजगार जनता क्यों विद्रोह के लिए उत्तेजित नहीं हो रही है? हमें विद्रोह करना चाहिए और भोग-विलास में डूबे अमीर वर्ग को बताना चाहिए कि श्रमिकों के हक को नाकार कर शोषण का दुश्चक्र अगर ऐसा ही चलते रहा तो देश में जो हिंसा भड़केगी उससे बच कर अमीर वर्ग अपने धनबल के आधार पर चैन का जीवन नही जी पाएगा।

(लेखक कृषि गो-विज्ञान समिति, अखिल भारतीय सर्वोदय मण्डल के संयोजक हैं और विदर्भ क्षेत्र के विविध जनान्दोलनों का नेतृत्व कर चुके हैं। सम्पर्क : ग्रीन पार्क, आशियाड कॉलोनी, शेगाँव रोड, अमरावती 444 604 महाराष्ट्र फोन – 09822 994821 ईमेल : vivekanand.amt@gmail.com)

मराठी से हिन्‍दी अनुवाद – अमित

यह प्रविष्टि आलेख में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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