कन्धमाल शान्ति प्रक्रिया

मार्च 2009

अंग्रेजी से अनुवाद : अमित

हम सभी जानते है कि ओडीशा के कन्धमाल जिले में विश्व हिन्दू परिषद् से जुडे़ स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वति की हत्या के बाद इसाई समुदाय को क्रोध व हिंसा का सामना करना पड़ा था। इन घटनाओं ने विश्वभर का ध्यान आकृष्ठ किया। आगजनी, मारपीट, सम्पत्ति को नुकसान, बलवा आदि की व्यापक घटनाओं के बाद लम्बे समय तक क्षेत्र में कर्फ्यू लगा रहा।

कर्फ्यू में छूट मिलते ही ओडीशा प्रदेश के कुछ जन संगठनों ने कन्धमाल जिल की स्थिति का जायज़ा लेने और शान्ति स्थापित करने की पहल की। इसमें बाजी राऊत छात्रावास, नव जीवन मण्डल, कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट, उत्कल सर्वोदय मण्डल, राष्ट्रीय युवा संगठन और नवनिर्माण समिति शमिल थे। वस्तुस्थिति की पड़ताल करने के लिए डॉ. बिस्वजीत राय के नेतृत्व में एक दल वहाँ पहुँचा। इसे दल को जो जानकारी मिली उसके आधार पर शान्ति प्रक्रिया पर विचार करने के लिए 7 से 10 सितम्बर 2008 को इस जन संगठनों की एक बैठक का आयोजन हुआ। बैठक में हुए निर्णय के आधार पर दो समर्पित कार्यकर्ता – अक्षय कुमार (संस्थापक, नवनिर्माण समिति) एवं डॉ. कुलमणि बारीक (नवनिर्माण समिति) 12 सितम्बर 2006 को कन्धमाल पहुँचे। तनाव एवं हिंसा समाप्त कर सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए इन्होंने फुलबणी में पड़ाव ड़ाला। इन कार्यकतााZओं के नेतृत्व में फुलबणी में शान्ति स्थापित करने के लिए जन संगठनों की प्रथम बैठक का आयोजन हुआ। 27 दिसम्बर को बालिगुण्डा प्रखण्ड के बुडुकिया ग्राम में 40 कार्यकर्ताओं का एक शिविर स्थापित किया गया।

इसके बाद लगभग एक माह तक वे प्रभावित क्षेत्र में घूमे और समाज के विभिन्‍न वर्गों से बातचीत की। इसमे विविध समुदायों के प्रमुख सज्जनों से लेकर आमजन तक शामिल थे। इन्होनें सर्वधर्म प्रार्थना और श्रमदान के माध्यम से समाज में व्याप्त संवादहीनता समाप्त करने का प्रयास किया। अनेक गाँवों में इस प्रक्रिया का सकारात्मक प्रभाव पड़ा जिसके परिणामस्वरूप लगभग 70 प्रतिशत इसाई अपने घरों में लौट आए। इसके बावजूद साम्प्रदायिक विद्वेष, परस्पर अविश्वास, शत्रुता और अनिश्चितता का भाव कायम रहा।

शिक्षकों की पहल :-

एक माह के शिविर के दौरान इस समूह से अनेक शिक्षिकों से भी भेंट की। इन्होंने पाया कि प्राथमिक शाला के अधिकांश शिक्षिकों में सामाजिक उत्तरदायित्व एवं एकता का जज्बा है। अत: इन युवा कार्यकर्ताओं ने अधिक से अधिक प्राथमिक शिक्षको से संवाद किया और उन्हें इस शान्ति प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास किया। वे इस नतीजे पर पहुँचे कि शान्ति प्रक्रिया में प्राथमिक शिक्षिकों की एक महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। आदर्श सेवानिवृत्त शिक्षक श्री अनन्त चरण साहू के सम्पर्क में आने से इनका यह विश्वास दृढ़ हो गया। श्री साहू `ऑल उत्कल प्रायमरी टीचर्स एसोसिएशन´ के उपाध्यक्ष रहे हैं और सेवा-निवृत्ति के बाद भी सलाहकार के रूप में जुड़े हुए हैं। उड़ीसा के सम्मानित व वरिष्ठ गांधीवादी अन्‍नपूर्णा महाराणा की प्रेरणा एवं अपील पर उन्होनें इन युवा कार्यकर्ताओं को एसोसिएशन के पदाधिकारियों से मिलवाया और इस प्रकार समविचारी समूहों के समन्वय का सूत्रपात हुआ।

शान्ति अभियान को आगे बढ़ाने के लिए कन्धमाल जिले में `नौशाही अपर प्रायमरी स्कूल´ में 65 शिक्षिकों की एक बैठक का आयोजन किया गया । इसमें 23 इसाई आदिवासी थे। उन्होंने जब कन्धमाल जिले में हुई हिंसा पर अपने अनुभव और विचार बनाए तो सबकी आँखे खुल गई। दोनों पक्ष हिंसा के शमन और शान्ति स्थापित करने के लिए उत्सुक थे । इसके बाद 120 प्राथमिक शिक्षिकों की एक और बैठक का आयोजन हुआ जिसमें आदिवासी, दलित और अन्य समुदायों के शिक्षिक शिक्षिकाएँ शामिल हुईं। बैठक में हिंसा की कड़े शब्दों में निन्दा की गई और इसे तत्काल बन्द करने की अपील की गई।

शान्ति प्रक्रिया आगे बढा़ने के लिए कार्ययोजना बनी :-

(1) 15 से 20 नवम्बर के दौरान चार वरिष्ठ शान्ति सेवकों द्वारा जिले के सर्वाधिक प्रभावित 6 प्रखण्डों के 70 गाँवों का दौरा करना, संवाद करना और कम से कम 24 गाँवों में बैठकों का आयोजन करना ।

(2) 29 नवम्बर से 13 दिसम्बर के बीच प्रदेश को एक सौ शिक्षिक कन्धमाल जिले में 15 दिनों की वाहन रैली आयोजित करेंगे। इस दौरान वे प्रत्येक गाँव में एक शान्ति समिति की स्थापना करेंगे।

(3) जिले की सर्वाधिक प्रभावित 70 ग्राम पंचायतों में शान्ति समिति की स्थापना।

(4) 28 से 30 दिसम्बर के दौरान चििन्हत 25 शिक्षकों को विशेष शान्ति प्रशिक्षण।

(5) बारह कलाकारों का एक जत्था हिंसा प्रभावित जिले के स्कूलों, महाविद्यालयों, गाँवों में जाकर `सह-आस्तित्व´ नुक्कड़ नाटक के माध्यम से समाज को भयमुक्त कर शान्ति स्थापना में योगदान देगा।

(6) संवाद के सभी उपलब्ध माध्यमों का उपयोग करते हुए देशभर के सभी साम्प्रदायिकता विरोधी समूहों, व्यक्तियों के सम्पर्क।

(7) सम्पूर्ण प्रक्रिया को समुचित दस्तावेजीकरण।

पृष्ठभूमि :-

सुन्दर पहाड़ों और सधन वनों से आच्छादित कन्धमाल जिला 2 सशक्त समुदायों का परम्परागत आवास है – आदिवासी (कन्ध, कुटिया, डंगरिया) और दलित (पाणा और अन्य)। इसके अलवा पैकिया, ओडिया जैसे अन्य `सामान्य´ समुदाय भी छोटी संख्या में यहाँ निवास करते हैं। आमतौर पर आदिवासी खेती करते है और जमीन के मालिक हैं, जबकि दलित छोटा-मोटा व्यापार करते हैं और आदिवासियों को विविध प्रकार की सेवाएँ प्रदान करते है। भूस्वामी होने के कारण आदिवासी समुदाय रोजगार देने वाला समूह है, जबकि दलित अपने श्रम और शिल्प पर निर्भर हैं। परम्परागत रूप से इनकी परस्पर पूरकता और सामंजस्य कायम रहाँ है।

पिछले चालीस सालों में व्यापारी, शासकीय सेवक और अप्रवासीयों के रूप में जिले के `बाहरी´ लोग बड़ी संख्या में आए हैं। वर्तमान आकड़ों के अनुसार जिले में 53 प्रतिशत आदिवासी, 16 प्रतिशत दलित और 31 प्रतिशत अन्य समुदाय निवास कर रहे हैं। पिछली सदी के आरम्भ से इस जिले में ईसाई मिशनरी ने शिक्षा और स्वास्थ सेवायें प्रदान करने का कार्य किया। इस वजह से वंचित दलित समुदाय लाभान्वित हुआ। अनेक बच्चों को शिक्षा मिली, स्वास्थ्य के विषय में जागरूकता बढ़ी और वे सामाजिक विकास के सोपानों पर ऊपर बढ़ने लगे। इनमें अधिकांश लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया। सन् 1947 में संयुक्त फुलबणी जिले में 2 प्रतिशत ईसाई थे, जो 1971 में बढ़कर 6 प्रतिशत हो गए। 1950 से 1980 के मध्य अनेक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन इस क्षेत्र ने देखे।

इसमें मुख्य हैं :-

1. जिन दलितों ने ईसाई धर्म अपनाया वे तेजी से विकसित हुए और उन्होंने काफी सम्पत्ति जुटा ली।

2. अपने इसाई उपनामों के कारण जिन शिक्षित दलितों को आरक्षण का लाभ नहीं मिला उन्होंने इसे अपने प्रति भेदभाव माना।

3. उडीसा सरकार द्वारा दिए जाने वाले आरक्षण में दलितों के मुकाबले आदिवासियों के लिए `कोटा´ अधिक रखा गया।परिणामस्वरूप दोनों समुदायों के बीच परस्पर शत्रुता का भाव पैदा हुआ।

4. इस दौरान यह आरोप लगाया गया कि कुई (आदिवासी) भाषा बोलने वाले पाना दलितों ने अपने कुई आदिवासी होने का प्रमाण-पत्र हासिल कर लिया और सरकारी नौकरी हथिया ली। कुई समुदाय के नेताओं ने 1600 ऐसे शासकीय सेवकों की सूची पेश करते हुए इसकी सेवाएँ समाप्त करने की माँग की ।

5. जिले के विकास के साथ ही बढ़ती व्यापारिक सम्भावनाओं ने प्रदेश के व्यापारियों को आकर्षित किया। इस प्रवासी व्यापारियों में अधिकांश सवर्ण हिन्दू थे। इन्होनें स्थानीय दलित दुकानदारों को विस्थापित किया।

6. स्वामी लक्ष्मणानंद शास्त्री ने 1967 में चकापदा में आदिवासियों के बीच एक कन्याश्रम की स्थापना की। उन्होंने हिन्दू रीति-रिवाजो और धर्म का प्रचार किया। मांसाहारी आदिवासियों का उन्होंने गौमाता का महत्व का ज्ञान कराया और उनमें गौ पूजा आरम्भ कराई ।

7. उनके कन्याश्रम ने अनेक आदिवासी कन्याओं को अपनाया और उन्हें अच्छा शिक्षण दिया, जीवन का अनुशासन सिखाया। उन्होंने खेती को उन्‍नत बनाने के प्रयास भी किए।

धर्मान्तरण विवाद :-

इसाईयत के प्रचार से स्वामीजी कथित थे और उन्होंने जिले में धर्मान्तरण के खिलाफ बोलना आरम्भ किया। उनका मानना था कि बलपूर्वक धर्मान्तरण कराया जा रहा है। जिले में ईसाई मिशनरियों की बढ़ती संख्या और लोगों को ईसाई बनाने में उनकी भूमिका – स्वामीजी के सार्वजनिक भाषणों का प्रमुख मुद्दा होता था ।

बाजार का प्रभाव :-

जिले में बाहर से अमीर व्यापारियों के आ जाने से स्थानीय समुदायों (आदिवासी और दलित दोनों ही) का प्रभाव कम होने लगा। कहा जाता है कि स्थानीय समुदाय मुखर होकर इन `बाहरी´ लोगों का विरोध करने लगा था।

व्यक्तिगत स्वार्थ :-

स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि बाहर से आए व्यापारियों ने देखा कि आदिवासी और दलित समुदायों के मन मे वैमनस्य के बीज हैं। उन्होंने इसे बढ़ाने के लिए नकली जाति-प्रमाण पत्रों के मुद्दे को हवा दी। इससे बाहरी व्यापारियों के खिलाफ इन दोनों स्थानीय समुदाय की एकता स्थापित नहीं हो सकी।

दंगे :-

इस प्रकार सन् 1984 में कन्धमाल जिले में पहली बार दंगे हुए। पाणा और कन्ध समुदाय के बीच हुए इस संघर्ष में 204 जानें गई। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार यह संख्या 300 से अधिक है। यह और आदिवासियों के बीच लम्बे समय से पनप रही वैमनस्यता का विस्फोटक परिणाम था। इसके ठीक दस वर्ष बाद 1994 में पुन: कन्ध और पाना समुदायों के बीच झगड़ा बढ़ा और उसने दंगे का रूप धारण कर लिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पाना समुदाय कन्ध आदिवासियों का शोषण कर रहे थे। इसकी परिणति दंगो के रूप में हुई है। इस टिप्पणी से दोनों समुदायों के बीच कटुता अधिक बढ़ गई। इस प्रकार अन्तत: इस संघर्ष को साम्प्रदायिक रंग मिल गया।

साम्प्रदायिक दंगे :-

सन् 2007 में दारिंगबाडी कस्बे के `कम्यूनिटी ग्राउण्ड´ में हिन्दुओं ने जान बूझ कर दुर्गा पूजा का आयोजन किया। इसके बाद आदिवासी इसाई समुदाय के लोगों ने दिसम्बर माह में उसी मैदान में अपने धार्मिक आयोजन का ऐलान किया। गौरतलब है कि कस्बे के दोनों प्रमुख राजनेता – आर. के. नायक (कांग्रेस) और सुग्रीव सिंह (बीजू जनता दल) दलित समुदाय से है। स्वामी लक्ष्मणानन्द ने कस्बे का दौरा किया और माना जाता है कि उन्होंने `सार्वजनिक स्थान´ पर ईसाई धार्मिक आयोजन का विरोध किया। इस पर ईसाई समुदाय ने रास्ता रोककर उन्हें गाँव में घुसने से रोका। इस जद्दोजहद में स्वामीजी घायल हुए और इतिहास में पहली बार कन्धमाल जिले में साम्प्रदायिक दंगा भड़का।

तथ्यों से खिलवाड़:-

पिछले वर्ष कुछ हिन्दू संगठनों ने जिले की हिन्दू-इसाई आबादी के आँकड़े प्रकाशित किये थे इसमें बताया गया कि 1971 की जनगणना में जो इसाई आबादी 6 प्रतिशत थी वह अब बढ़कर 17 प्रतिशत हो गई है। उनका निष्कर्ष था कि यह हिन्दुओं के बल पूर्वक धर्मान्तरण का नतीजा है। यह बताना आवश्यक है कि सन् 2001 में फुलबणी जिले को दो भागों मे विभाजित करते हुए `कन्धमाल´ और `बौध´ नामक दो जिलों का निर्माण हुआ था। अधिकांश इसाई लोग कन्धमाल में रहते हैं और बौध जिले में हिन्दू और आदिवासियो की बहुलता रही। वर्ष 2007 के क्रिसमस के समय इसाईयो पर हमले किये गए। कुछ साम्प्रदायिक तत्वों ने व्यापारी समुदाय से मिलकर दलित-आदिवासियों के मूल मुद्दे को चालाकी से हिन्दू-ईसाई संघर्ष के रूप में खड़ा कर दिया। इस महौल में दुर्भाग्यवश 23 अगस्त 2008 को स्वामी लक्ष्मणनन्द हत्या कर दी गई। यद्यपि माओवादियों ने इसकी जिम्मेदारी ले ली थी, फिर भी हिन्दू संगठनो ने इसका दोष इसाइयों के सिर मढ़ा। इसके बाद भड़के दंगों में दलित और इसाई दोनों समुदायों के इसाइयों को समान रूप से निशाना बनाया गया।

हमने देखा है कि दोनो ही समुदायों के इसाई राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि दिसम्बर 2007 के बाद से ही हिन्दू-इसाई विभेद की खाई को चौड़ा किया जा रहा था और ईसाई समुदाय को निशाना बनाकर हमला करने की तैयारी चल रही थी।

वर्तमान स्थिति:-

लगभग 1 हजार पैतालिस गिरिजाघरों को नष्ट किया जा चुका है। चार हजार मकान ध्वस्त किये गये हैं। दलितों (अधिकांशत: इसाई) को घरों से खदेड़ दिया गया। इनमें से 25 हजार लोग राहत शिविरों में है और 40 हजार लोग ड़र से अज्ञात स्थानों पर छिपे हुए है। राहत शिविरों में रहने वाले दलितों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा है कि आदिवासियों ने उन पर हमला किया। केन्द्र सरकार और सामाजिक संगठनों के अत्यधिक दबाव के कारण राज्य पुलिस ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के सहयोग से आदिवासियों को गिरफ्तार करना आरम्भ किया। वर्तमान में अधिकांश आदिवासी पुरुष गिरफ्तारी के भय से जंगलों में छिपे हुए हैं।

इस प्रकार सामाजिक-आर्थिक समस्या को क्रमश: धार्मिक-सम्प्रदायिक रूप देकर स्वार्थी तत्वों तथा साम्प्रदायिक शक्तियों ने अपना हित साधा है। इस घिनौने साम्प्रदायिक खेल का नतीजा यह हुआ है कि दलित और इसाई समुदाय राहत शिविरों या छिपे हुए स्थानों में है और आदिवासी समुदाय हवालात में बन्द है या फिर जंगलों में छिपा है।

समस्याओं के मूलभूत कारण:-

गरीबी, शोषण और भ्रष्टाचार – कन्धमाल ओडीशा के निर्धनतम जिलों में एक है। दिन भर के कठोर श्रम के बाद लोग यहाँ दस रुपये की मजदूरी कमा पाते हैं। दलाल, व्यापारी और कर्मचारी वर्ग द्वारा यहाँ अत्यधिक शोषण किया जा रहा है। खनिज क्षेत्र की बड़ी कम्पनियों के आने और बेरोजगारी के चलते विस्थापन भी यहाँ बड़ी समस्या है। सरकरी कर्मचारी/अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार यहाँ आम है। इसलिए निहित स्वार्थी तत्वों ने इन बातों से ध्यान हटाने के लिये मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देने की भरपूर कोशिश की है।

समाधान :-

आवश्यक है कि परस्पर विश्वास पुर्नस्थापित किया जाए और साथ ही गरीबी उन्मूलन, शोषण तथा भ्रष्टाचार की समाप्ति की योजना बनाई जाए। इस प्रकार हम स्थायी शान्ति की ओर बढ़ सकेंगे ।

यात्रा की तिथि :-

नवंबर 17 से 19 – 2008 समूह के सदस्य –

1. श्री आनन्त चरण साहू (सलाहाकार, ऑल उत्कल प्रायमरी टीचर्स फेडरेशन)

2. श्री अक्षय कुमार (नवनिर्माण समिति)

3. डॉ. कुलमणि (अन्तर्राष्ट्रीय गांधी विश्वविद्यालय)

4. डॉ. डी. जॉन चेल्लादुराई (निदेशन, इण्डिया पीस सेन्टर)

5. श्री समरेन्द्र दास (महासचिव, जिला प्राथमिक शिक्षक संघ कन्धमाल)

6. श्री विमल कृष्ण बेहरा (अध्यक्ष, जिला प्राथमिक शिक्षक संघ कंधमाल)

-: सम्पर्क

अक्षय कुमार

नवनिर्माण समिति

849/5051, तलसाही, पटिया,

भुबनेश्वर 751 031 (ओडीशा)

फोन – 0 9937427611/ 0674-3206874

यह प्रविष्टि रपट में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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