आजादी की मशाल

मई 2008


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बुनियादी मानवाधिकार है और भारत का संविधान भी इसे एक मौलिक आधिकार मानता है। मगर तसलीमा नसरीन को परेशान होकर देश छोड़ना पड़ा। देश के बुद्धिजीवी, लेखकों व कलाकारों की ओर से जो विरोध हुआ उसे प्रतीकात्मक या कर्मकाण्डी विरोध का जा सकता है। तिब्बत में चीन जो दमन कर रहा है, उसकी खबरें मिलना सम्भव नहीं। वहाँ से पत्रकारों, फोटोग्राफरों और यहाँ तक कि सैलानियों को भी बाहर खदेड़ कर चीन ने अपने दरवाजे बन्द कर लिये हैं। इराक पर अमरीकी हमले के जैसे विरोध प्रदर्शन दुनियाभर में हुए थे, वैसे ही प्रदर्शन तिब्बती समुदाय और उनके समर्थन में स्वतंत्रताप्रेमी लोग कर रहे हैं।

मगर भारत में क्या हो रहा है? नेहरू के जमाने में चीन की नाराजगी के बावजूद दलाई लामा को भारत में सम्मानपूर्वक शरण दी गयी। मगर अब जो रवैया भारत सरकार ने अपनाया है, वह न केवल तिब्बतियों के खिलाफ है, वरन् भारत की निर्भय और लोकतंत्र समर्थक छवि को भी धूमिल करता है। ओलिम्पक मशाल का दुनिया भर में जो विरोध हुआ, उसने जता दिया है कि तिब्बत की आजादी का मुद्दा अब भी ज्वलन्त है। अभूतपूर्व सुरक्षा के बावजूद ओलिम्पक मशाल भले की बुझा कर पुन: प्रज्वलित करनी पड़ी हो, तिब्बत की आजादी की मशाल अनवरत् जल रही है।

अगर बुद्धिजीवी वर्ग दलाई लामा के अहिंसक आन्दोलन के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ तो तिब्बती युवाओं का दबा हुआ आक्रोश किस दिशा में व्यक्त होगा कहा नहीं जा सकता। भारत तिब्बत का न केवल भौगोलिक पड़ौसी है, वरन् बुद्ध की भूमि होने के कारण तिब्बतियों के लिये पूजनीय और सांस्कृतिक प्रेरणा का स्त्रोत भी है। उनकी हमसे कई अपेक्षाएँ हैं।

हम क्या कर रहे हैं? यह हमें सोचना है।

यह प्रविष्टि सम्पादकीय में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

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